हरियाणा में वर्षों से नियमित नौकरी की उम्मीद लगाए बैठे हजारों कच्चे, अनुबंधित और अस्थायी कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत की खबर आई है। लंबे समय से चल रहे विवादों के बीच अब Punjab and Haryana High Court ने ऐसा फैसला सुनाया है, जिससे कर्मचारियों की उम्मीदें फिर से बढ़ गई हैं।
अदालत ने साफ किया है कि अब कर्मचारियों के नियमितीकरण के मामलों को पुराने तरीके से नहीं, बल्कि Madan Singh vs State of Haryana के आधार पर नए सिरे से देखा जाएगा। इसका सीधा मतलब है कि हर कर्मचारी के मामले की अलग-अलग जांच होगी।
हाई कोर्ट ने सरकार को क्या निर्देश दिए?
जस्टिस अश्विनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ ने 98 अपीलों की सुनवाई के बाद हरियाणा सरकार और उसके विभिन्न विभागों को अहम निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा है कि बिजली निगमों, नगर निगमों, हाउसिंग बोर्ड और अन्य सरकारी संस्थाओं को हर कर्मचारी के रिकॉर्ड की व्यक्तिगत जांच करनी होगी। साथ ही छह महीने के भीतर कारण सहित “स्पीकिंग ऑर्डर” जारी करना होगा, ताकि हर फैसला स्पष्ट और पारदर्शी रहे।
कर्मचारियों को मिली सबसे बड़ी राहत
इस फैसले की सबसे अहम बात यह है कि जब तक किसी कर्मचारी के मामले पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक उसकी मौजूदा नौकरी की स्थिति में कोई नकारात्मक बदलाव नहीं किया जाएगा। यानी फिलहाल कर्मचारियों को नौकरी से हटाने या उनके खिलाफ नुकसान पहुंचाने वाली कार्रवाई पर रोक जैसी सुरक्षा मिल गई है। इससे उन कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है, जो लंबे समय से अस्थिर नौकरी की स्थिति में काम कर रहे थे।
पुरानी नीतियों पर अब नए नियम लागू होंगे
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अब 1996, 2003, 2011, 2014 और 2024 की नियमितीकरण नीतियों को सीधे लागू नहीं किया जाएगा। इन सभी नीतियों को अब सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक सिद्धांतों के तहत परखा जाएगा। अदालत ने Uma Devi Case और योगेश त्यागी मामले का भी उल्लेख किया। कोर्ट का कहना है कि अब राज्य सरकार को हर कर्मचारी की पात्रता, सेवा रिकॉर्ड और नीति की वैधता को ध्यान में रखकर फैसला लेना होगा।
कर्मचारियों को क्या करना होगा?
अदालत ने कर्मचारियों को भी जरूरी निर्देश दिए हैं। हर कर्मचारी को आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के दो सप्ताह के भीतर अपने विभाग को विस्तृत अभ्यावेदन देना होगा। इस प्रक्रिया के बाद विभाग संबंधित कर्मचारी के रिकॉर्ड की समीक्षा करेगा और फिर अंतिम फैसला लिया जाएगा। यानी अब मामला सीधे अदालत के बजाय प्रशासनिक स्तर पर दोबारा जांच के लिए जाएगा।






