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स्टेशन पर तो कई पटरियां होती है फिर ड्राइवर को क़ैसे पता चलता है सही ट्रैक, इस तरीके से सही ट्रैक का पता लगाते है ट्रेन ड्राइवर

जब हम ट्रेन की यात्रा करते हैं तो अक्सर हमारे मन में एक सवाल उठता है कि लोको पायलट (Loco Pilot) को कैसे पता चलता है कि किस ट्रैक (Track) पर ट्रेन को ले जाना है?
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जब हम ट्रेन की यात्रा करते हैं तो अक्सर हमारे मन में एक सवाल उठता है कि लोको पायलट (Loco Pilot) को कैसे पता चलता है कि किस ट्रैक (Track) पर ट्रेन को ले जाना है? आज हम इसी जिज्ञासा का समाधान करेंगे और जानेंगे कि एक स्टेशन (Station) पर मौजूद कई ट्रैक्स में से सही ट्रैक का चयन किस प्रकार किया जाता है।

सही ट्रैक की पहचान

रेलवे स्टेशनों पर जहां एक से अधिक ट्रैक्स होते हैं, वहाँ होम सिग्नल (Home Signal) की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। रेल मंत्रालय (Rail Ministry) ने खुद इस बात की जानकारी दी है कि सिग्नल के माध्यम से ही लोको पायलट को यह संकेत मिलता है कि उसे किस ट्रैक पर गाड़ी को ले जाना है।

होम सिग्नल का कार्य और महत्व

जब कोई ट्रैक कई भागों में विभाजित होता है तो उस विभाजन के ठीक 300 मीटर पहले होम सिग्नल लगा होता है। इस सिग्नल पर रूट सिग्नल (Route Signal) भी होता है, जो न केवल सही ट्रैक बताता है बल्कि ट्रेन को सुरक्षित स्टेशन तक पहुँचाने का सिग्नल भी देता है।


लोको पायलट और असिस्टेंट लोको पायलट

एक दिलचस्प तथ्य यह है कि हर ट्रेन में दो ड्राइवर होते हैं: एक लोको पायलट (Loco Pilot) और एक असिस्टेंट लोको पायलट (Assistant Loco Pilot)। इसका मुख्य कारण यह है कि अगर एक को नींद आने लगे तो दूसरा ड्राइवर ट्रेन को संभाल लेता है। यह व्यवस्था सुरक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है।

ट्रेन की अपने आप रुकने की व्यवस्था

रेलवे ने एक ऐसी व्यवस्था भी तैयार की है कि अगर दोनों ड्राइवर को नींद आ जाए, तो ट्रेन अपने आप रुक जाती है और कंट्रोल रूम (Control Room) को इसकी सूचना मिल जाती है। यह आपातकालीन सुरक्षा प्रणाली (Emergency Safety System) रेल यात्रियों की सुरक्षा को सुनिश्चित करती है।