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इस जनजाती की महिलाएं जानवरो को भी पिलाती है अपना दूध, प्रकृति और बेजुबान जानवरों के प्रति समर्पित है ये लोग

राजस्थान के बिश्नोई समाज के लोग छह सौ वर्षों से प्रकृति (Nature) की अराधना करते आ रहे हैं। इस समुदाय की नींव ही प्रकृति और जीव-जंतुओं (Wildlife) के प्रति अगाध प्रेम और संरक्षण पर आधारित है।
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bishnoi women breastfeed animals

राजस्थान के बिश्नोई समाज के लोग छह सौ वर्षों से प्रकृति (Nature) की अराधना करते आ रहे हैं। इस समुदाय की नींव ही प्रकृति और जीव-जंतुओं (Wildlife) के प्रति अगाध प्रेम और संरक्षण पर आधारित है। उनका मानना है कि प्रकृति के बिना उनका अस्तित्व ही नहीं है।

मातृत्व की अनूठी मिसाल

बिश्नोई समाज की महिलाएं (Bishnoi Women) अपने आप में एक अनूठी मिसाल पेश करती हैं, जब वे हिरन के बच्चों (Deer Fawns) को अपना दूध पिलाती हैं। यह नजारा बाहरी व्यक्ति को अवश्य ही चकित कर सकता है, परंतु इस समाज के लिए यह प्रकृति के प्रति उनके समर्पण और प्रेम का प्रतीक है। ये महिलाएं डरे हुए और अनाथ हिरन के बच्चों को अपने बच्चों की तरह पालती-पोसती हैं।

परिवार का हिस्सा है जानवर

बिश्नोई समाज (Bishnoi Community) में जानवरों को परिवार का एक हिस्सा माना जाता है। चाहे वो अनाथ जानवर हों या घायल, समाज की महिलाएं उनकी देखभाल करती हैं जैसे कि वे उनके अपने हों। यह उनके लिए सिर्फ एक कर्तव्य नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति (Culture) और धर्म का एक अनिवार्य हिस्सा है।

हिन्दू धर्म और श्री जम्बेश्वर भगवान के उपदेश

बिश्नोई समाज के लगभग दो हजार घर हिन्दू धर्म (Hinduism) को मानते हैं और श्री जम्बेश्वर भगवान (Lord Jambheshwar) के उपदेशों का पालन करते हैं। इन उपदेशों में प्रकृति के प्रति सम्मान और जीवों के प्रति करुणा की शिक्षा दी गई है।

समाज और संस्कृति का संगम

एक बिश्नोई महिला के अनुसार जानवरों और उनके अपने बच्चों में कोई भेद नहीं है। जब ये जानवर उनके संरक्षण में होते हैं, तो वे अनाथ नहीं होते। यहां तक कि जब इन बच्चों की मां नहीं होती, तो उनके शरीर में मां के दूध की कमी को बिश्नोई महिलाएं अपने दूध से पूरा करती हैं। यह समाज और संस्कृति (Society and Culture) का एक अनूठा संगम है, जो प्रकृति और मानवता के बीच की गहरी एकता को दर्शाता है।