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भारत ने सिर्फ एक गांव के लिए पाकिस्तान को दे दिए थे 12 गांव, इस मजबूरी के चलते नेहरू जी ने लिया था ये डिसीजन

1947 में भारत के बंटवारे (Partition) के बाद 1961 में एक और अनोखी घटना घटी। भारत ने पाकिस्तान को 12 गांव देकर एक गांव हुसैनीवाला को वापस लिया। इस अनूठे बदलाव की वजह क्या थी?
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Why India gave 12 villages to Pakistan

1947 में भारत के बंटवारे (Partition) के बाद 1961 में एक और अनोखी घटना घटी। भारत ने पाकिस्तान को 12 गांव देकर एक गांव हुसैनीवाला को वापस लिया। इस अनूठे बदलाव की वजह क्या थी? यह सवाल कई लोगों के मन में उठता है।

हुसैनीवाला का ऐतिहासिक महत्व

हुसैनीवाला गांव का भारतीय (Independence) स्वतंत्रता संग्राम में बहुत महत्व है। यहाँ भारत माता के वीर सपूत भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की (Samadhi) समाधि है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।

शहीदों की अंतिम यात्रा

23 मार्च 1931 को इन तीनों शहीदों को लाहौर जेल में (Execution) फांसी दी गई थी। उनके शव को सतलुज नदी के किनारे अधजला छोड़ दिया गया था, जो इतिहास के पन्नों में एक काला अध्याय है।

बंटवारे के बाद हुसैनीवाला की वापसी

1947 के बंटवारे (Partition) में हुसैनीवाला पाकिस्तान के हिस्से में चला गया था। इसके महत्व को समझते हुए शहीदों के परिजनों ने हुसैनीवाला को वापस भारत में लाने की मुहिम शुरू की। उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू से इसके लिए अपील की।

नेहरू और पाकिस्तान के बीच समझौता

पंडित नेहरू ने पाकिस्तान से बातचीत कर हुसैनीवाला को वापस लेने का समझौता किया। इसके बदले में भारत ने पाकिस्तान को 12 गांव दिए। इस समझौते के पीछे का उद्देश्य था हुसैनीवाला के ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्व को संजोना।

शहीदों की स्मृति में स्मारक

1973 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह की पहल पर हुसैनीवाला में तीनों शहीदों की याद में एक भव्य (Memorial) स्मारक बनाया गया। हर वर्ष 23 मार्च को यहां शहीदी मेले का आयोजन होता है, जो इन वीरों को श्रद्धांजलि देने का एक अवसर होता है।

क्रांतिकारियों की अंतिम इच्छा

हुसैनीवाला में न केवल भगत सिंह बल्कि उनके साथी क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त का भी अंतिम संस्कार हुआ। यह उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार उसी स्थल पर हो, जहां उनके साथियों की मिट्टी है।