दिल्ली के कनॉट प्लेस का कैसे पड़ा ये अनोखा नाम, इसके पीछे का कारण जानकर तो आपको भी नही होगा विश्वास

By Vikash Beniwal

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दिल्ली की आत्मा और इसके सांस्कृतिक ताने-बाने की एक महत्वपूर्ण कड़ी है कनॉट प्लेस जिसे स्थानीय लोग प्यार से ‘सीपी’ कहते हैं। यहाँ आकर आपको दिल्ली के इतिहास और वर्तमान का संगम देखने को मिलेगा। आज हम आपको इस आर्टिकल में कनॉट प्लेस के इतिहास के बारे में बताने जा रहे है जिसे दिल्ली का दिल भी कहा जाता है।

कनॉट प्लेस का नाम और इतिहास

कनॉट प्लेस का नामकरण ब्रिटिश राज के दौरान प्रिंस आर्थर, ड्यूक ऑफ कनॉट के नाम पर हुआ था। यह वह स्थल है जहां कभी ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता के संकेत के तौर पर शासन की महत्वाकांक्षाओं का प्रतीक बनाया गया था। स्वपना लिडल की किताब ‘कनॉट प्लेस एंड द मेकिंग ऑफ न्यू डेल्ही’ में इस बात का वर्णन है कि कैसे इस जगह को डिजाइन किया गया था ताकि यह नई दिल्ली के सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से एक बन सके।

चार साल की मेहनत से बना कनॉट प्लेस

कनॉट प्लेस का निर्माण 1929 से 1933 के बीच हुआ था। इसे ब्रिटिश आर्किटेक्ट रॉबर्ट टॉर रसेल ने डिजाइन किया था। यह डिजाइन ब्रिटेन के बाथ शहर में स्थित रॉयल क्रिसेंट से प्रेरित था। इसकी वास्तुकला ने इसे नई दिल्ली के अग्रणी स्थानों में शुमार कर दिया था।

आधुनिक काल में कनॉट प्लेस का विकास

वर्तमान समय में कनॉट प्लेस दिल्ली के सबसे बड़े व्यावसायिक केंद्रों में से एक है। यहाँ दुनिया भर के प्रसिद्ध ब्रांड्स की दुकानें, विशाल रेस्टोरेंट्स और आधुनिक सुविधाएँ मौजूद हैं। कनॉट प्लेस का इनर सर्किल, जिसमें सेंट्रल पार्क और पालिका बाजार स्थित हैं यह दिल्ली की पहली वातानुकूलित भूमिगत मार्केट है और आज भी इसकी अपनी एक अनोखी पहचान है।

Vikash Beniwal

मेरा नाम विकास बैनीवाल है और मैं हरियाणा के सिरसा जिले का रहने वाला हूँ. मैं पिछले 4 सालों से डिजिटल मीडिया पर राइटर के तौर पर काम कर रहा हूं. मुझे लोकल खबरें और ट्रेंडिंग खबरों को लिखने का अच्छा अनुभव है. अपने अनुभव और ज्ञान के चलते मैं सभी बीट पर लेखन कार्य कर सकता हूँ.