बकरी की ये नस्ल दूध देने के मामले में गाय से भी है आगे, दूध बेचकर अपने मालिक को बना देती है मालामाल

By Vikash Beniwal

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भारतीय कृषि समाज में किसानों की आर्थिक स्थिति में पशुपालन का बड़ा योगदान है। खासकर बकरी और भेड़ पालन के द्वारा किसानों को न केवल आय का स्थायी स्रोत मिलता है, बल्कि यह कम लागत में अधिक मुनाफा भी देती है। बकरी पालन को कभी-कभी ‘चलता-फिरता ATM’ भी कहा जाता है जिसके पीछे का मुख्य कारण इससे होने वाली ज्यादा आय है। बकरी पालन की महत्वता और इसके लाभों को समझना हर आदमी के लिए जरूरी है।

बुंदेलखंड में बकरी पालन की प्रचलित नस्लें

बुंदेलखंड क्षेत्र में बकरी पालन का चलन काफी प्रचलित है। इस क्षेत्र में मुख्य रूप से सिरोही नस्ल की बकरियां पाली जाती हैं जो मूल रूप से राजस्थान की नस्ल हैं। सिरोही बकरियां दोहरे लाभ के लिए प्रसिद्ध हैं क्योंकि ये न केवल दूध देती हैं बल्कि इनका मांस भी बाजार में ज्यादा मांग में रहता है। इसके अलावा इनकी खाल से बने उत्पाद भी बाजार में बहुत ज्यादा डिमांड रहती हैं। ये नस्लें बुंदेलखंड की गर्म जलवायु में भी अच्छी तरह से सर्वाइव कर लेती हैं।

बीटल नस्ल

बीटल नस्ल जिसे अक्सर ‘गरीबों की गाय’ के नाम से भी जाना जाता है इसकी खासियत यह है कि यह बकरी नस्ल सबसे ज्यादा दूध देने वाली होती है। इस नस्ल की बकरियां न केवल दुधारी होती हैं बल्कि इनका मांस भी बाजार में अधिक मांग में रहता है। ये बकरियां अमृतसरी बकरी के नाम से भी प्रसिद्ध हैं और इनकी प्रजाति विशेष रूप से डेयरी उत्पादन के लिए उपयुक्त मानी जाती है।

बकरी पालन के दौरान नस्ल का चुनाव जरूरी

बकरी पालन में नस्ल का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण होता है। बुंदेलखंड में पाली जाने वाली सिरोही और बीटल नस्लें इस क्षेत्र के लिए उपयुक्त पाई गई हैं क्योंकि ये नस्लें न केवल दूध और मांस के उत्पादन में खास हैं बल्कि इन्हें बुंदेलखंड की भिन्न-भिन्न जलवायुओं के अनुसार ढालने की क्षमता भी है।

Vikash Beniwal

मेरा नाम विकास बैनीवाल है और मैं हरियाणा के सिरसा जिले का रहने वाला हूँ. मैं पिछले 4 सालों से डिजिटल मीडिया पर राइटर के तौर पर काम कर रहा हूं. मुझे लोकल खबरें और ट्रेंडिंग खबरों को लिखने का अच्छा अनुभव है. अपने अनुभव और ज्ञान के चलते मैं सभी बीट पर लेखन कार्य कर सकता हूँ.